07/06/2026/ राव शफात अली / देहरादून /
उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष Ritu Khanduri Bhushan ने अपने पिता एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय B. C. Khanduri की स्मृति में उन्हें काव्यांजलि अर्पित कर भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी।
काव्यांजलि में उन्होंने अपने पिता के व्यक्तित्व, कर्तृत्व और जनसेवा के प्रति उनके समर्पण को याद करते हुए लिखा कि उनका जीवन ईमानदारी, अनुशासन और राष्ट्रसेवा का प्रेरणास्रोत है। काव्यांजलि के माध्यम से उन्होंने स्वर्गीय बी.सी. खंडूड़ी के प्रति अपनी श्रद्धा एवं सम्मान व्यक्त किया,
काव्यांजलि में ऋतु खंडूरी ने अपने पिता के अहसास को शब्दों में ऐसे लिखा –
*काव्यांजलि- जनरल बी सी खण्डूडी*
जय और दुर्गा की गोद से, एक शेर निकल कर आया था,
भारत माँ के चरणों में, जीवन उसने चढ़ाया था।
वो पहाड़ का सिपाही और माटी का लाल था,
सीमा पर वो डटा रहा, दुश्मनों का काल था।
तीन-तीन रण देखे उसने, धधकते युद्धों की आग में,
सीना तान के खड़ा रहा वो, तिरंगे की शान में।
गोली, बारूद, अँधियारे सब, उसके आगे हार गए,
वो देश पे मरना सीख गया, उससे भय भी पार गए।
वो पहाड़ का सिपाही था, देश उसका अभिमान था,
ईमानदारी की राजनीति में, जैसे कोई भगवान था।
फिर आया वो जनता में, सत्ता उसके लिए नहीं,
सेवा ही उसका धर्म रही, कुर्सी की कोई चीत नहीं।
जब समझौतों का दौर चला, वो पर्वत सा अड़ा रहा,
ना पद झुका, ना मन डिगा, वो कर्मठ खड़ा रहा।
पहाड़ की टूटी राहों में, उसने अपना कल देखा था,
हर सूने गाँव के चेहरे पर, विकास का संबल देखा था।
उत्तराखंड के हर आँसू को, उसने अपना मान लिया,
जनता का सेवक बन, जनमन का अभियान लिया।
राहें केवल पत्थर भर नहीं, राष्ट्र-धर्म की डोरी थीं,
अटल संकल्पों की ज्योति लिए, उसकी आँखें भोरि थीं।
“जनरल, देश जोड़ दो” का जब, अटल पुकार ने स्वर पाया,
स्वर्णिम चतुर्भुज बनकर फिर, भारत ने नव पथ अपनाया।
ईस्ट-वेस्ट, नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर से, भारत का विस्तार जुड़ा,
गाँव-गाँव तक सड़क पहुँचाकर, जनजीवन का संसार जुड़ा।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क से, सपनों को भी राह मिली,
दूर पहाड़ों की चौखट पर, विकास की पहली चाह मिली।
और फिर वो दिन भी आया, जब शोर बहुत था, खेल बड़े
सच अकेला खड़ा रहा था, चेहरे कई थे, मेल बड़े।
कोटद्वार की धरती पूछे—क्या हार गया था वो सच में?
या कपट और चालों वाले, जीते थे छल के रथ में?
चुनाव भले ही हार गया, चरित्र नहीं हारा वो,
जनता के दिल में बसने वाला और चमका सितारा वो।
आज हिमालय भी चुप होगा, गंगा भी बहती रोती होगी,
खण्डूडी की साँस बंद हुई तो अरुणा भी उनको खोती होगी। ~ ऋतु खण्डूडी भूषण

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